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* पाचन शक्ति ठीक रखनी हो तो ठीक वक्त पर भोजन करें और प्रत्येक कौर को 32 बार चबाएँ।
* यदि यौनशक्ति ठीक रखनी हो तो कामुक चिंतन न किया करें और सप्ताह में एक से अधिक बार सहवास न किया करें।
* यह गलतफहमी है कि अण्डा, माँस खाने से बल बढ़ता है और शराब पीने से आनंद आता है। अण्डा, माँस खाने से शरीर मोटा-तगड़ा जरूर हो सकता है पर कुछ बीमारियाँ भी इसी से पैदा होती हैं। शराब पीने से आनंद नहीं आता, बेहोशी आती है और बीमारियाँ होती हैं।
* अपनी आर्थिक शक्ति से अधिक धन खर्च करने वाला कर्जदार हो जाता है। अपनी शारीरिक शक्ति से अधिक श्रम करने वाला कमजोर हो जाता है। अपनी क्षमता से अधिक विषय भोग करने वाला जल्दी बूढ़ा और नपुंसक हो जाता है और अपने से अधिक बलवान से शत्रुता करने वाला नष्ट हो जाता है।
* यदि आप मुफ्त में स्वस्थ और चुस्त बने रहना चाहते हैं तो आपको तीन काम करना चाहिए। पहला तो प्रातः जल्दी उठकर वायु सेवन के लिए लम्बी सैर के लिए जाना और दूसरा ठीक वक्त पर खूब अच्छी तरह चबा-चबाकर खाना तथा तीसरा दोनों वक्त शौच अवश्य जाना।
* बीमारी की अवस्था में, बीमारी से मुक्त होने के बाद, भोजन करने के बाद, परिश्रम या यात्रा से थके होने पर प्रातःकाल तथा सूर्यास्त के समय और उपवास करते समय विषय भोग करना बहुत हानिकारक होता है।
* यदि आप सुख चाहते हैं तो दुःख देने वाला काम न करें, यदि आप आनंद चाहते हैं तो स्वास्थ्य की रक्षा करें। यदि आप स्वास्थ्य चाहते हैं तो व्यायाम और पथ्य का सेवन करें। संसार के सब सुख स्वस्थ व्यक्ति ही भोग सकता है। कहा भी गया है- पहला सुख निरोगी काया।
गुलाब : यूँ तो गुलाब त्वचा का सौन्दर्य निखारने में सदियों से माहिर है। गुलाब के फूलों की पत्तियाँ त्वचा को पोषण देती हैं, त्वचा के रोम-रोम को सुगंधित बनाती हैं, ठंडक प्रदान करती हैं। गुलाब के 2 फूलों को पीसकर, आधा प्याले कच्चे दूध में 30 मिनट तक भिगोएँ, फिर इस लेप को आहिस्ता-आहिस्ता त्वचा पर मलें, सूखने पर ठंडे-ठंडे पानी से स्नान कर लें। शरीर की त्वचा नर्म, मुलायम और गुलाबी आभायुक्त दिखाई देगी। गर्मियों में गुलाब के फूलों का रस चेहरे पर मलने से चेहरे पर ठंडी-ठंडी ताजगी बनी रहती है।
केवड़ा : यूँ तो यह एक बेहतरीन खुशबू का फूल है। इसके इत्र की तासीर ग्रीष्म में तन को शीतलता प्रदान करती है। केवड़े के पानी से स्नान करने से शरीर की जलन व पसीने की दुर्गंध से भी छुटकारा मिलता है। गर्मियों में नित्य केवड़ायुक्त पानी से स्नान करने से शरीर में शीतलता बनी रहती है।
गेंदा : इसके पीले केसरिया फूल त्वचा को निखारने में विशेष उपयोगी है। स्किन टॉनिक बनाने के लिए 5 गेंदे के ताजे फूलों की पत्तियों को एक प्याला पानी में भिगो दें। 3 घंटे उपरांत पत्तियों को पानी में मसलकर छान लें। इस पानी का लेप त्वचा पर करें। थोड़ी देर बाद स्नान कर लें। त्वचा का सौन्दर्य तो निखरेगा ही, ठंडक का एहसास भी होगा।
एल्डर फ्लॉवर : इस फ्लॉवर को आधा प्याला पानी में रखने के उपरांत, प्याले के पानी को चेहरे पर मलें। त्वचा दाग धब्बोंरहित कोमल बनेगी।
ब्ल्यू विज हैजल : कुदरत का यह फूल भी सौन्दर्य निखारने में माहिर है। इस फूल में छिपे प्राकृतिक गुण त्वचा में कसाव भी लाते हैं व शीतलता भी प्रदान करते हैं। इसकी पत्तियाँ एक कप पानी में भिगों दें। 30 मिनट बाद पत्तियों को अच्छी तरह मसलकर छान लें। इसका लेप त्वचा पर करें। सौन्दर्य तो निखरेगा ही, ठंडी-ठंडी ताजगी का अनुभव भी होगा।
कमल : कमल के फूलों को धारण करने से शरीर शीतल रहता है। फोड़े-फुँसी आदि शांत होते हैं। शरीर पर विष का कुप्रभाव कम होता है। गुलाब, बेला, जूही आदि के अलंकरण हृदय को प्रिय होते हैं। इससे मोटापा कम होता है। चंपा, चमेली, मौलसरी आदि के प्रयोग से शरीर दाह की कमी तथा रक्त विकार दूर होते हैं और मन प्रसन्न रहता है।
बहुत ज्यादा काम या नया काम ही तनाव नहीं देता। कई बार वही पुराना काम व नए चुनौतीपूर्ण काम का अभाव भी हमें टेंशन दे सकता है! अगर आप लगातार एक जैसा काम करते हुए बोर हो रहे हैं तो संभल जाइए यह आपकी सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है।
बोर होने के नुकसान : -
1 लगातार बोर होते रहने से जीवन में नीरसता आ जाती है, इससे चेहरे की त्वचा अपनी चमक खोने लगती है।
2 जीवन के प्रति उत्साह ना रहने से चिड़चिड़ापन और उद्वीग्नता आ जाती है।
3 आँखें बुझी-बुझी लगती है।
4 छोटे-छोटे रोग शरीर में घर बनाने लगते हैं।
5 सबसे पहला असर प्राकृतिक भूख पर पड़ता है। भोजन के प्रति अरुचि होने लगती है।
क्या करें :- बोरियत से बचने के लिए अपनी रुचि के अनुरूप कार्यों के लिए समय निकालें। कुछ समय योग, भक्ति या व्यायाम के लिए निकालें। मित्रों एवं परिवार वालों के साथ समय बिताएँ। प्राकृतिक स्थानों पर जाएँ। ऐसी पुस्तकें पढ़ें, जिनमें आपकी रुचि हो। मनपसंद संगीत सुनें। सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएँ।
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बोर होने के नुकसान : -
1 लगातार बोर होते रहने से जीवन में नीरसता आ जाती है, इससे चेहरे की त्वचा अपनी चमक खोने लगती है।
2 जीवन के प्रति उत्साह ना रहने से चिड़चिड़ापन और उद्वीग्नता आ जाती है।
3 आँखें बुझी-बुझी लगती है।
4 छोटे-छोटे रोग शरीर में घर बनाने लगते हैं।
5 सबसे पहला असर प्राकृतिक भूख पर पड़ता है। भोजन के प्रति अरुचि होने लगती है।
क्या करें :- बोरियत से बचने के लिए अपनी रुचि के अनुरूप कार्यों के लिए समय निकालें। कुछ समय योग, भक्ति या व्यायाम के लिए निकालें। मित्रों एवं परिवार वालों के साथ समय बिताएँ। प्राकृतिक स्थानों पर जाएँ। ऐसी पुस्तकें पढ़ें, जिनमें आपकी रुचि हो। मनपसंद संगीत सुनें। सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएँ।
मानवीय विषयों पर किए गए विशेष क्लिनिकल अनुसंधान से यह तथ्य उजागर हुआ है कि हृदय संबंधी बीमारियों की रोकथाम के लिए हमारी रोजमर्रा की डाइट में चाय सेवन की प्रमुख भूमिका है। अमेरिका कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी के एक शोध के अनुसार काली चाय हृदय के लिए काफी अच्छी है। इसमें मौजूद फ्लेवेनाइड्स एंटीऑक्सीडेंट हृदय के सेल्स तथा ऊतकों की ऑक्सीकरण से होने वाली क्षति से सुरक्षा करते हैं। एक अन्य शोध से पता चलता है कि चाय का सेवन थक्के बनने की प्रक्रिया को नियंत्रित रखता है जिससे हृदयाघात की आशंका कम हो जाती है। रक्त में एंटीऑक्सीडेंट का घनत्व बढ़ने से चाय हृदय के लिए लाभदायक है।
कुल 3454 पुरुष एवं महिलाओं पर यह अध्ययन किया गया, जो 55 वर्ष या इससे अधिक आयु के हैं तथा जिन्हें हृदय संबंधी कोई गंभीर रोग नहीं है। इन सभी को हरी चाय के बजाय काली चाय का सेवन कराया गया। ब्रिटेन के आहार विशेषज्ञों ने एक अध्ययन में पाया कि एक दिन में चार कप चाय पीने से दिल के दौरे की आंशका कम हो जाती है। इसी प्रकार दाँतों के लिए भी चाय को लाभदायक माना गया है क्योंकि इसमें फ्लोराइड की मात्रा भी होती है। एक अध्ययन से पता चलता है कि काली चाय दाँतों में गंदगी की परत व छेद बनने से रोकती है। यही नहीं, इससे बैक्टीरिया का भी नाश होता है।
इसके पूर्व जापान में किए गए एक अध्ययन से पता चला था कि हरी चाय में कैविटीरोधी क्षमता होती है। काली चाय में मौजूद पॉलीफेनोल्स दाँतों में कैविटी पैदा करने वाले जीवाणुओं का खात्मा करता है। काली चाय दाँतों की सतह से परत को चिपकाने वाले चिपचिपे पदार्थ के निर्माण को भी रोकती है।
एक कप कड़क चाय पीकर बहुतों को जवानी का एहसास होता है, लेकिन उनमें से कुछ चाय पीने की आदत से परेशान भी रहते हैं। वैज्ञानिक-चिकित्सकों की मानें तो ऐसे लोगों को कतई परेशान नहीं होना चाहिए, क्योंकि चाय हमारे डीएनए में होने वाली गड़बड़ियों को रोकती है और यह तो सबको मालूम ही है कि डीएनए ही वह चीज है जो हमें एक खास रूप और पहचान देता है।
ब्रिटेन की हेरियट-वाट यूनिवर्सिटी और नॉरबिच स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ फूड रिसर्च में किए गए इस शोध के अनुसार हरी व काली चाय में एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जो मुक्त ऑक्सीजन अणुओं के प्रभाव को बेअसर करते हैं और शरीर में कैंसर होने की आशंकाओं को खत्मकरते हैं। साथ ही चाय के पीने से शरीर में पानी की पूर्ति होती है यानी वह निर्जलीकरण से बचाती है। जहाँ सुरक्षित पानी उपलब्ध न हो, वहाँ चाय पीकर पानी की पूर्ति की जा सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि चाय त्वचा के कैंसर से भी बचाती है। इसमें मौजूद प्लेमोनायड तत्व सूर्य की हानिकारक अल्ट्रावाइलेट किरणों से त्वचा को नुकसान पहुँचाने से बचाते हैं। प्रतिदिन 4 कप या इससे ज्यादा चाय पीना, पानी पीने के बनिस्बत ज्यादा फायदेमंद है। इस बात का खुलासा वैज्ञानिकों ने किया है। सामान्य तौर पर यह माना जाता है कि चाय डिहाइड्रेशन (शरीर में पानी की कमी) को बढ़ाती है, लेकिन शोधकर्ताओं के अनुसार असल में चाय शरीर में पानी की मात्रा तो बढ़ाती ही है तथा साथ में हृदयाघात व कैंसर के खतरे को भी कम करती है। शोध से पता चला है कि शरीर के अंदर के अपशिष्ट पदार्थों से लड़ने वाला प्रमुख एंटीऑक्सीडेंट तत्व फ्लेवेनाइड्स चाय में भरपूर मात्रा में पाया जाता है। यह अजीर्णता को कम करता है, हड्डियों को मजबूत करता है और दाँतों की क्षति होने से रोकता है। चाय में पाए जाने वाला कैफीन दिमाग को चुस्त रखने में मदद करता है।
शोधकर्ता डॉ. कैरी रक्स्टन का कहना है कि 'अगर चाय को नुकसानदेह चीज समझते हैं तो आप पुराने ख्याल के हैं। चाय स्वास्थ्य का अहम हिस्सा है और यह कई बीमारियों से आपका बचाव कर सकती है। हाँ, लेकिन इतना याद रखिएगा- 'अति हर चीज की बुरी होती है।'
पिछले करीब 5 सालों से हर दिन नहाने के बाद 15 मिनट ताली बजाता हूँ। मेरा अनुभव रहा है कि बेहद खराब जीवन शैली व रोगों के घर मोटापे के बावजूद केवल इस आदत ने अब तक मेरी रक्षा की है। ताली बजाने के फायदे पर मेरा भरोसा इस कदर बढ़ा है कि कोई पेट या सिर में होने वाली किसी भी परेशानी के लिए अच्छे डॉक्टर की सलाह माँगता है तो मैं पहले ताली की महिमा का बखान करने लग जाता हूँ। जिन लोगों ने मेरी यह सलाह मानी वे सभी मेरे शुक्रगुजार हैं। पिछले महीने की एक घटना के बाद लगा कि मुझे अपना यह अनुभव विशाल पाठक वर्ग से भी बाँटना चाहिए। खबरों की टोह लेने कुछ लंबे छरहरे स्वास्थ्य रिपोर्टरों के साथ शास्त्री भवन में था। वहाँ खुली सस्ती जेनेरिक दवा की सरकारी दुकान में घुस गया। वहाँ कक्ष में बैठे एमबीबीएस डॉक्टर से हम सब ने अपना ब्लड-प्रेशर नपवाया। मेरे ब्लड-प्रेशर की 120/80 रीडिंग देख कर उन्हें सहज यकीन ही नहीं आया।
लेकिन अगर अपने अनुभव की बात करूँ तो ताली बजाने के अनगिनत फायदे हैं। नियमित रूप से ताली बजा कर कीर्तन-भजन करने वालों पर 'भगवान' की कितनी कृपा होती है यह तो किसी को पता नहीं लेकिन मेरा विश्वास है कि निश्चित रूप से कई रोग उनके पास नहीं फटक पाते होंगे।
दक्षेस देशों के स्वास्थ्य पत्रकारों के संगठन 'हेल्थ एसेईस्ट एंड ऑथर्स लीग' (हील) के संस्थापक सेक्रेटरी जनरल की हैसियत से पत्रकारों के वर्कशॉप में मैं यही कहते हुए शुरू करता था कि इतनी बड़ी तोंद होते हुए मुझे स्वास्थ्य पर भाषण देने का हक नहीं है।
तोंद होना कई बीमारियों का घर माना जाता है लेकिन मैं अपने लंबे अनुभव के आधार पर अब स्वास्थ्य संपादक की हैसियत से यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि ताली बजाने के कई फायदे हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में लंबे अनुभव को इलाज की किसी विधि के प्रभावी होने के प्रमाण के रूप पेश किया जा सकता है ।
ताली बजाना इलाज की प्रभावी विधि एक्यूप्रेशर का एक सहजतम रूप है। कभी मुझे अक्सर डिप्रेशन (अवसाद) घेरे रहता था। सिर हमेशा भारी भारी, अक्सर दर्द, पेट में गैस, कभी भी कुछ हो जाने का डर सवार रहता था। केवल ताली बजाने मात्र से मेरी सारी समस्याएँ दूर हो गई हैं। आत्मविश्वास भी काफी बढ़ा है। लगता है, ताली बजाता रहूँ तो कभी कोई रोग होगा ही नहीं ।
कहने का यह मतलब कतई नहीं है कि कोई गंभीर रोग है तो सबकुछ छोड़कर ताली पीटना शुरू कर दें। किडनी खराब हो गई है तो ताली पीटने से वह ठीक नहीं होने वाली। यह रोगों से बचाव में बहुत अधिक प्रभावी है लेकिन रोग हो गया है तो ताली उसकी दवा नहीं हो सकती। हाँ, इतना तय है कि इलाज के साथ-साथ ताली बजाएँ तो जल्दी फायदा जरूर होगा । मैं काँटेदार बेलन पर तलवे को 10 मिनट घिसता भी हूँ। यह भी एक्यूप्रेशर की ही विधि है ।
मेरा एक दूसरा अनुभव भी बाँटने योग्य है। सिर के बाल के तेजी से झड़ने को रोकने की कवायद में खासा परेशान था। सिर के बीच में चाँद निकल आया था। कई उपाय किए। बाल झड़ना बंद नहीं हुआ। लगा इस गति से तो जल्द ही सफाचट हो जाएगा। तभी किसी ने सरसों तेल आजमाने की सलाह दी।
अंगूर सारे भारत में आसानी से उपलब्ध फल है। इसमें विटामिन-सी तथा ग्लूकोज पयाप्त मात्रा में पाया जाता है। यह शरीर में खून की वृद्धि करता है और कमजोरी दूर करता है। यही कारण है कि डॉक्टर लोग मरीजों को फलों में अंगूर ही खाने की सलाह देते हैं।
अंगूर को संस्कृत में द्राक्षा, बंगला में बेदाना या मनेका, गुजराती में धराख, फारसी में अंगूर, अरबी में एनवजबीब, इंग्लिश में ग्रेप या ग्रेप रैजिन्स तथा लैटिन में विटिस् विनिफेरा कहते हैं।
अंगूर के औषधि गुण : प्रत्येक 100 ग्राम अंगूर में लगभग 85.5 ग्राम पानी, 10.2 ग्राम कार्बोहाइड्रेट्स, 0.8 ग्राम प्रोटीन, 0.1 ग्राम वसा, 0.03 ग्राम कैल्शियम, 0.02 ग्राम फास्फोरस, 0.4 मिलीग्राम आयरन, 50 मिलीग्राम विटामिन-बी, 10 मिलीग्राम विटामिन-सी, 8.4 मिलीग्राम विटामिन-पी, 15 यूनिट विटामिन-ए, 100 से 600 मिलीग्राम टैनिन, 0.41-0.72 ग्राम टार्टरिक अम्ल पाया जाता है।
अंगूर को संस्कृत में द्राक्षा, बंगला में बेदाना या मनेका, गुजराती में धराख, फारसी में अंगूर, अरबी में एनवजबीब, इंग्लिश में ग्रेप या ग्रेप रैजिन्स तथा लैटिन में विटिस् विनिफेरा कहते हैं।
अंगूर के औषधि गुण : प्रत्येक 100 ग्राम अंगूर में लगभग 85.5 ग्राम पानी, 10.2 ग्राम कार्बोहाइड्रेट्स, 0.8 ग्राम प्रोटीन, 0.1 ग्राम वसा, 0.03 ग्राम कैल्शियम, 0.02 ग्राम फास्फोरस, 0.4 मिलीग्राम आयरन, 50 मिलीग्राम विटामिन-बी, 10 मिलीग्राम विटामिन-सी, 8.4 मिलीग्राम विटामिन-पी, 15 यूनिट विटामिन-ए, 100 से 600 मिलीग्राम टैनिन, 0.41-0.72 ग्राम टार्टरिक अम्ल पाया जाता है।
सभी बीमारियों में फायदेमंद : अंगूर में क्षारीय तत्व बढ़ाने की अच्छी क्षमता के कारण ही शरीर में यूरिक एसिड की अधिकता, मोटापा, जोड़ों का दर्द, रक्त का थक्का जमना, दमा, नाड़ी की समस्या व त्वचा पर लाल चकत्ते उभरने आदि स्थितियों में इसका सेवन लाभकारी होता है।
अंगूर का सेवन, आँत, लीवर व पचान संबंधी अन्य रोगों, मुँह में कड़वापन रहना, खून की उल्टी होना, गुर्दे की कार्यक्षमता में कमी, कब्जियत, मूत्र की बामारी, अतिसार कृमि रोग, टीबी (क्षय रोग) आदि रोगों में विशेष लाभकारी होता है।
* यदि किसी ने धतूरा खा लिया हो, तो उसे अंगूर का सिरका दूध में मिलाकर पिलाने से काफी लाभ होता है। अंगूर मियादी बुखार, मानसिक परेशानी, पाचन की गड़बड़ी आदि भी काफी लाभकारी है।
* अंगूर रक्त की क्षारीयता सन्तुलित करता है, क्योंकि रक्त में अम्ल व क्षार का अनुपात 20:80 होना चाहिए। यदि किसी कारणवश शरीर में अम्लता बढ़ा जाए, तो वह हानिकारक साबित होता है। अंगूर बढ़ती अम्लता को आसानी से कन्ट्रोल करता है।
* अंगूर का 200 ग्राम रस शरीर को उतनी ही क्षारीयता प्रदान करता है, जितना कि एक किलो 200 ग्राम बाईकार्बोनेट सोडा, हालाँकि सोडा इतनी अधिक मात्रा में लिया नहीं जा सकता।
* अंगूर के रस को कलई के बर्तन में पकाकर गाढ़ा करके सोते समय आँखों में लगाने से जाला, फूला आदि नेत्र रोगों दूर हो जाते हैं।
* अंगूर की बेल काटने से जो रस निकलता है, वह त्वचा रोगों में लाभकारी होता है।
* अंगूर के पत्तों का अर्क एक से तीन चम्मच तक लेने पर व बावासीर के मस्सों पर लगाने पर काफी लाभ मिलता है। 500 मिलीग्राम से एक ग्राम तक पत्तों की भस्म शहद से लेने से भी बवासीर में लाभ मिलता है।
लाइफ स्टाइल बदलने से हेल्थ की कई प्रॉब्लम्स अपने आप चली जाती हैं। मसलन यदि आप देर तक सोने के आदी थे और अब जल्दी उठने लगे हैं तो डेफिनेटली आपकी हेल्थ में पॉजिटीव इम्प्रूवमेंट होगा। इसलिए दवाएँ छोड़ना हों तो दिनचर्या बदल डालिए।
हमें बहुत सारी महँगी दवाइयाँ खाकर भी अपनी बीमारी से मुक्ति नहीं मिल पाती। क्या आपकी बीमारी का इलाज सिर्फ दवाइयाँ हैं? नित नई ऊँचाइयों को छूने की अंधी दौड़ में अस्त-व्यस्त जीवन व अत्यधिक तनाव ही हमारे हिस्से में आता है। परिणामस्वरूप कार्यक्षमता घट जाती है। बीमारियाँ, मानसिक विकार, निराशा व खीज व्यक्ति को घेरने लगते हैं।
इन बीमारियों के लिए जिम्मेदार हमारी जीवनशैली है। ये नतीजा है, स्वास्थ्य व जीवनशैली के बीच के असंतुलन का, परंतु हम बीमारी की जड़ को देखे बिना बस दवाइयाँ खाने पर विश्वास करते हैं। क्या कभी आपने सोचा है कि उच्च-रक्तचाप, मधुमेह, दिल की बीमारियाँ, हायपरकोलेस्ट्रोलेमिया मोटापा या जोड़ों का दर्द आदि इन बीमारियों की जड़ क्या है? उदाहरण के लिए यदि आप उच्च-रक्तचाप से पीड़ित हैं और रोज दवाइयाँ खा रहे हैं। यह आपके लिए हानिकारक है। इसकी शुरुआत कहाँ से होती है?
अनिद्रा, मोटापा, ध्रूमपान, शराब का सेवन, व्यायाम की कमी, तनाव व अनियमित तथा असंतुलित खानपान की आदतें, इसके लिए जिम्मेदार कारण हैं। हम आनुवंशिक कारणों को नहीं बदल सकते, परंतु बाकी के सारे कारणों का इलाज तो हमारे हाथ में है।
हमें बहुत सारी महँगी दवाइयाँ खाकर भी अपनी बीमारी से मुक्ति नहीं मिल पाती। क्या आपकी बीमारी का इलाज सिर्फ दवाइयाँ हैं? नित नई ऊँचाइयों को छूने की अंधी दौड़ में अस्त-व्यस्त जीवन व अत्यधिक तनाव ही हमारे हिस्से में आता है। परिणामस्वरूप कार्यक्षमता घट जाती है। बीमारियाँ, मानसिक विकार, निराशा व खीज व्यक्ति को घेरने लगते हैं।
इन बीमारियों के लिए जिम्मेदार हमारी जीवनशैली है। ये नतीजा है, स्वास्थ्य व जीवनशैली के बीच के असंतुलन का, परंतु हम बीमारी की जड़ को देखे बिना बस दवाइयाँ खाने पर विश्वास करते हैं। क्या कभी आपने सोचा है कि उच्च-रक्तचाप, मधुमेह, दिल की बीमारियाँ, हायपरकोलेस्ट्रोलेमिया मोटापा या जोड़ों का दर्द आदि इन बीमारियों की जड़ क्या है? उदाहरण के लिए यदि आप उच्च-रक्तचाप से पीड़ित हैं और रोज दवाइयाँ खा रहे हैं। यह आपके लिए हानिकारक है। इसकी शुरुआत कहाँ से होती है?
अनिद्रा, मोटापा, ध्रूमपान, शराब का सेवन, व्यायाम की कमी, तनाव व अनियमित तथा असंतुलित खानपान की आदतें, इसके लिए जिम्मेदार कारण हैं। हम आनुवंशिक कारणों को नहीं बदल सकते, परंतु बाकी के सारे कारणों का इलाज तो हमारे हाथ में है।
नियमित व्यायाम : 30-45 मिनट कोई भी एरोबिक एक्टिविटी करें। स्विमिंग, जॉगिंग, डांस, एक्सरसाइज, ब्रिस्क वॉक में से कोई भी एक्टिविटी आप कर सकते हैं।
पानी पिएँ - पानी शरीर में विषैले पदार्थ बाहर निकालने में मदद करता है। यह शरीर में पानी का स्तर बनाए रखने के साथ-साथ त्वचा को भी युवा एवं चिकनी बनाए रखता है। शरीर के तापमान को भी नियंत्रित करता है। कभी भी प्यास लगने का इंतजार न करें।
नियमित ब्रेकफास्ट करें- यह दिन का सबसे महत्वपूर्ण आहार है। यह आपको दिनभर कार्य करने की ऊर्जा प्रदान करने के साथ-साथ आपकी एकाग्रता एवं याददाश्त बढ़ाता है। मांसपेशियों के तालमेल को बढ़ाता है। टाइप-2 डायबिटीज व दिल के रोगों के जोखिम को कम करता है। अपने नाश्ते में गेहूँ, जुवार, बाजरा, रागी, ब्राउन राइस, दलिया, कॉर्न फ्लेक्स, व्हीट फ्लेक्स या कोई भी एक अनाज शामिल करें।
दूध व उससे बने पदार्थ : रोज कम से कम 1 गिलास दूध पिएँ। अपने सुबह और शाम के भोजन में दही को शामिल करें। छाछ, पनीर इन्हें भी आहार में शामिल करें। छाछ में दूध की तुलना में कम वसा होती है। दही प्रोटीन व कैल्शियम का अच्छा स्रोत है।
सब्जियाँ खाएँ : अपने आहार में सभी सब्जियों को शामिल करें। ये विटामिंस, मिनरल्स, एन्टीऑक्सीडेंट्स के सबसे अच्छे स्रोत हैं।
अंकुरित अन्न : शाकाहारी भोजन में प्रोटीन का सबसे अच्छा स्रोत है अंकुरित अनाज, इसे साफ करके खाना चाहिए।
पेय : चाय, कॉफी व शकर का प्रयोग सीमित मात्रा में करें। ये सभी मूत्रवर्धक होते हैं तथा अत्यधिक मात्रा में लेने पर शरीर में पानी की कमी होने लगती है।
ध्यान करें : दिनभर में 15-20 मिनट का समय स्वयं के साथ बिताएँ। ध्यान करें, अपने किसी भी शौक को कम से कम 15-20 मिनट का वक्त दें। ये आपके तनाव को खत्म कर देगा। आप ऊर्जावान महसूस करेंगे।
जीवनशैली बदलें : प्रोफेशनल और सोशल लाइफ के बीच संतुलन स्थापित करने की जरूरत है। इसके लिए जीवनशैली में परिवर्तन लाएँ। अपनी क्षमताओं का न केवल अधिकतम उपयोग करें बल्कि उनमें निरंतर बढ़ोतरी करें। जीवनभर सुखी और स्वस्थ रह सकें, इस पर जरूर विचार करें।
नींद- कम से कम 7-8 घंटे की नींद लें। यह आपका प्राकृतिक टॉनिक है। आपकी आँखों के नीचे काले घेरों का एक कारण भरपूर नींद न लेना है। अनिद्रा के कारण तनाव, काले घेरे, उच्च रक्तचाप आदि बीमारियाँ होती हैं।
क्या यह सुनने-सुनते आपके कान पक गए हैं कि ज्यादा बातें करना अच्छी बात नहीं? ...तो यह भी सुन लीजिए कि वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि बातें करने से आपका दिमाग तेज होता है और मानसिक स्वास्थ्य बढ़िया रहता है।
माना जाता है, बातें बनाना बुरी बात है। लोग अक्सर कहते भी हैं, इस तरह बातें बनाने से बात नहीं बनेगी। लोग बातूनी लोगों को अक्सर व्यंग्य से इस तरह वाक्पटु कहते हैं मानो उन्हें चिढ़ा रहे हों। लेकिन बातें बनाना या ज्यादातर लोगों से संवाद स्थापित कर लेना न तो किसी बेवकूफी की निशानी है और न ही इससे कोई नुकसान है। भले ही लोग कहते हों कि बातें बनाने से कुछ नहीं होगा, मगर वैज्ञानिकों ने एक विस्तृत शोध के जरिए साबित किया है कि बातें बनाना न सिर्फ बुद्धिमान बनने का जरिया है, बल्कि निरंतर और हर तरह के लोगों से संवाद कला में माहिर होने वाले लोग जीनियस भी साबित होते हैं।
मिशिगन यूनिवर्सिटी (अमेरिका) ने एक विस्तृत शोध में पाया है कि जब आप रोजाना 10 मिनट किसी के साथ किसी भी विषय पर बातचीत करते हैं तो इससे न केवल आप धीरे-धीरे संवाद कला में माहिर होते जाते हैं, बल्कि इससे याददाश्त भी तेज होने लगती है और बुद्धिमत्ता भी बढ़ने लगती है। इस तरह याददाश्त और बुद्धिमत्ता को सक्रिय बनाए रखने के लिए लोगों के साथ बातचीत करना जरूरी है। यहाँ तक कि वर्ग पहेलियाँ भी इसके मुकाबले कम असरकारक हैं।
इंस्टीट्यूट फॉर सोशल रिसर्च ऑफ मिशिगन यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक ऑस्कर याबरी, जो इस शोध के साथ जुड़े थे, उनके मुताबिक दिमागी कसरत स्वास्थ्य के लिए उतनी ही जरूरी है जितनी जिस्मानी कसरत। दिमागी कसरत का सबसे आसान और उर्वर तरीका है विभिन्न किस्म के लोगों के साथ प्रतिदिन कम-से-कम 10 मिनट बातचीत करना।
माना जाता है, बातें बनाना बुरी बात है। लोग अक्सर कहते भी हैं, इस तरह बातें बनाने से बात नहीं बनेगी। लोग बातूनी लोगों को अक्सर व्यंग्य से इस तरह वाक्पटु कहते हैं मानो उन्हें चिढ़ा रहे हों। लेकिन बातें बनाना या ज्यादातर लोगों से संवाद स्थापित कर लेना न तो किसी बेवकूफी की निशानी है और न ही इससे कोई नुकसान है। भले ही लोग कहते हों कि बातें बनाने से कुछ नहीं होगा, मगर वैज्ञानिकों ने एक विस्तृत शोध के जरिए साबित किया है कि बातें बनाना न सिर्फ बुद्धिमान बनने का जरिया है, बल्कि निरंतर और हर तरह के लोगों से संवाद कला में माहिर होने वाले लोग जीनियस भी साबित होते हैं।
मिशिगन यूनिवर्सिटी (अमेरिका) ने एक विस्तृत शोध में पाया है कि जब आप रोजाना 10 मिनट किसी के साथ किसी भी विषय पर बातचीत करते हैं तो इससे न केवल आप धीरे-धीरे संवाद कला में माहिर होते जाते हैं, बल्कि इससे याददाश्त भी तेज होने लगती है और बुद्धिमत्ता भी बढ़ने लगती है। इस तरह याददाश्त और बुद्धिमत्ता को सक्रिय बनाए रखने के लिए लोगों के साथ बातचीत करना जरूरी है। यहाँ तक कि वर्ग पहेलियाँ भी इसके मुकाबले कम असरकारक हैं।
इंस्टीट्यूट फॉर सोशल रिसर्च ऑफ मिशिगन यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक ऑस्कर याबरी, जो इस शोध के साथ जुड़े थे, उनके मुताबिक दिमागी कसरत स्वास्थ्य के लिए उतनी ही जरूरी है जितनी जिस्मानी कसरत। दिमागी कसरत का सबसे आसान और उर्वर तरीका है विभिन्न किस्म के लोगों के साथ प्रतिदिन कम-से-कम 10 मिनट बातचीत करना।
शोध में यह भी साबित हुआ कि संवाद करने में उदासीन रहने वाले लोग, फिर चाहे वे प्रखर वैज्ञानिक ही क्यों न हों, उनकी याददाश्त कमजोर हो जाती है। यह महज संयोग नहीं है कि दुनिया के ज्यादातर महान वैज्ञानिकों को कमजोर स्मृति का शिकार पाया गया है।
शायद इसके पीछे कारण यही है कि ये वैज्ञानिक आमतौर पर अपनी दुनिया में ही खोए रहते हैं। अपने काम में डूबे रहते हैं। इससे अपने काम में तो ये माहिर होते हैं, लेकिन अपने क्षेत्र के हीरो जीवन के क्षेत्र में जीरो साबित हो जाते हैं। दूसरी तरफ पाया गया है कि ऐसे लोग जो अक्सर लोगों के साथ संवाद-संपर्क में रहते हैं, उनकी स्मृति काफी तेजी होती है।
यही वजह है कि राजनेताओं, टेलीफोन ऑपरेटरों, कंपनियों के स्वागताधिकारियों, कंडक्टरों, दुकानदारों और उन तमाम पेशे के लोगों की याददाश्त काफी तेज होती है, जो दिन में कई बार अलग-अलग तरह के लोगों के संवाद-संपर्क में आते हैं।
इस संवाद से एक बड़ा फायदा यह होता है कि इससे विवरण को समझने के नए कोण हासिल हो जाते हैं और विभिन्न दृष्टिकोणों से रू-ब-रू होने पर अपने दृष्टिकोण की गहराई का पता चल जाता है। साथ ही उसे दुरुस्त करने का रास्ता भी दिख जाता है। सवाल है आखिर अलग-अलग या ज्यादातर लोगों से संवाद रखने से स्मृति कैसे तीव्र होती है और बुद्धिमत्ता में इजाफा क्यों होता है?
व्यापक शोध से जो निष्कर्ष निकलकर आए हैं उनके मुताबिक विभिन्न किस्म के लोगों के साथ विभिन्न किस्म का संवाद स्थापित करने वाले लोगों में बिम्बों की रचना तीव्र होती है। जब भी हम किसी से कोई बात सुनते हैं तो दिमाग उस बात को बाद में भी याद रखने के लिए उसे एक छवि में बदल देता है और फिर वह छवि या बिम्ब दिमाग में स्टोर हो जाता है। जो लोग बहुत कम लोगों से सामाजिक सरोकार रखते हैं, उन लोगों में बिम्बों की रचना तीव्रता से नहीं होती। लेकिन जो लोग बहुत लोगों से संवाद करते हैं उनमें बिम्बों का बनना तेज होता है और ये बिम्ब ज्यादा मजबूत होते हैं।
इसके विरुद्ध जब हम लोगों से मिलते-जुलते नहीं, उनसे बातें नहीं करते तो हमारी अपनी समझ भी गैर आजमाई किस्म की समझ बन जाती है। किसी के साथ संवाद करना दरअसल अपनी समझ को अनुमान के दायरे से निकालकर मान्यता के मैदान में उतार देना है। अगर ज्यादातर लोग उसकी काट नहीं ढूँढ पाते तो आपकी समझ जीत जाती है और अगर लोग आपकी समझ को टिकने नहीं देते तो आपको अपनी समझ को और बेहतर व तर्कपूर्ण बनाने की चुनौती हासिल होती है।
इसलिए सामाजिक रूप से सक्रिय रहना मानसिक और शारीरिक दोनों ही तरह से स्वास्थ्य के लिए बेहतर है। इससे बौद्धिक क्षमता भी बढ़ती है, अतः जब कोई कहे कि क्या बातों में लगे रहते हैं? तो उसकी बात को अनसुनी कर दें और बातों में मशगूल रहें।